कोरिया: चलती ट्रेन में दिया बच्चे को जन्म। (वेदप्रकाश तिवारी की रिपोर्ट)

कोरिया: तारीख 19 अगस्त 2018. छत्तीसगढ़ संपर्क क्रांति झांसी से गुजर रही थी. रफ्तार 100 किलोमीटर के आस पास रही होगी. रात 11 बजे के आस पास का समय. S3 कोच में कुमारी यादव अपनी सास के साथ यात्रा कर रही थी. कुमारी उस परिवार और छत्तीसगढ़ के उस इलाके से आती है जहां के लोग मजदूरी करने देश भर में जाते हैं. उसे भाटपारा में उतरना था. झांसी आने से पहले ही कुमारी के पेट में तेज दर्द शुरू हुआ. झांसी में गाड़ी रुकी तो डॉक्टर बुलाया गया. उसने अपने हिसाब से कोई दवा दे दी कि दर्द कम हो जाए. लेकिन वैसा नहीं हुआ. डॉक्टर वहीं वापस उतर गया. दर्द बढ़ता ही गया. ट्रेन से उतरने का कोई चांस नहीं था क्योंकि झांसी गुजर चुका था और अगला स्टॉप ढाई बजे था, सागर स्टेशन.
उसी कोच में रफत खान अपने पति सोहेल के साथ यात्रा कर रही थीं. इन्हें भिलाई जाना था. दोनों मियां बीवी दिल्ली से ट्रेन पर बैठे थे. रफत को अहसास हुआ कि कुमारी का पेट दर्द नॉर्मल नहीं है. ये लेबर पेन है. हिंदी में- प्रसव पीड़ा. थोड़ी देर देखने के बाद रफत ने हिम्मत दिखाई और डिलिवरी का चार्ज अपने हाथ में ले लिया. रफत को न तो कोई डिलिवरी का एक्सपीरिएंस है न ही कोई मेडिकल बैकग्राउंड. लेकिन उन्होंने लोगों से मदद मांगनी शुरू की.
लगभग सभी लोग जाग चुके थे. सबके अंदर का इंसान भी जाग चुका था. फिर सभी ने हेल्प की, जिससे जो हो सकता था सब किया. सोहेल ने डेटॉल और सैनिटाइजर वगैरह दिल्ली से खरीद लिया था, इमरजेंसी के लिए. पैंट्री वालों को बोला गया तो वो पानी गरम करके लाए. थर्ड एसी कम्पार्टमेंट से चादर और कंबल वगैरह आए. डिलिवरी कार्यक्रम शुरू हुआ. वहीं एक सहयात्री ने अपनी बहन को फोन लगाया, जो इन मामलों की जानकार थी. कुछ लोगों ने यूट्यूब पर वीडियोज देखकर इंस्ट्रक्शन देने शुरू किए.
ये सब चलता रहा, पूरे कम्पार्टमेंट में सबके कान उधर ही लगे हुए थे. टीसी महेश, विनोद, मनोज और रमेश बराबर फोन पर अपने महकमे से संपर्क कर रहे थे. ताकि जल्दी मदद मिल सके. 12 बजकर 48 मिनट पर बच्ची पैदा हुई. सबने खुशी खुशी तालियां बजाकर उसका इस दुनिया में स्वागत किया. मिठाई बांटी गई. सारे लोग एकदूसरे को बधाई दे रहे थे. रफत और कुमारी की खुशी एक समान थी. दोनों के चेहरों पर अब एक संतोष था. बच्ची की गर्भनाल में बांधने के लिए धागा नहीं मिल रहा था तो चादर को फाड़कर उसका हिस्सा पानी में गरम किया गया. कोई भाईसाहब अपने साथ शेविंग ब्लेड लेकर जा रहे थे. उससे गर्भनाल काटी गई.
उसी हंसी खुशी के माहौल में सबने बच्ची का नामकरण करना शुरू कर दिया. कोई कह रहा था- संपर्क क्रांति में पैदा हुई है तो इसका नाम क्रांति रख दो. कोई झांसी की रानी बोल रहा था. फिर सागर स्टेशन आया और टीसी ने जैसा इंस्ट्रक्शन दे रखा था, वो वहां देखने को मिला. वहां सारी व्यवस्था पहले से थी और जच्चा बच्चा को वहां पहुंचते ही मेडिकल ट्रीटमेंट मिल गया. जिसकी जरूरत डिलिवरी के तुरंत बाद होती है. इस तरह उस कम्पार्टमेंट के लोगों ने इंसानियत की मिसाल कायम की.
उम्मीद है अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि ये किसी शॉर्टफिल्म की कहानी नहीं बल्कि असल घटना थी. हमें हमारे दोस्त अनुज जायसवाल ने इसकी जानकारी दी. ये सारे फोटो और वीडियोज भेजे. हमने सोहेल खान से भी बात की और पूछा उनके एक्सपीरिएंस के बारे में. उन्होंने बताया कि ये तो खुदा का करम है कि हम उस वक्त वहां मौजूद थे और जरूरतमंद के काम आ सके. सबने मदद की और सब बड़े आराम से हो गया.

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