बदायूँ: तुलसी साहित्यिक एवं समाजिक संस्था द्वारा कार्यालय पर महान क्रांतिकारी विरसा मुंडा का बलिदान दिवस मनाया गया

बदायूँ: तुलसी साहित्यिक एवं समाजिक संस्था द्वारा कार्यालय पर महान क्रांतिकारी विरसा मुंडा का बलिदान दिवस मनाया गया
संस्था अध्यक्ष अतुल श्रोत्रिय ने अध्यक्षता की  और विरसा मुंडा के जीवन पर प्रकाश डालते हुये कहा कि विरसामुंडा का बलिदान भुलाया नहीं जा सकता है विरसा मुंडा एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे ये मुंडा जाति से संबंधित थे वर्तमान भारत में रांची और सिंह भूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को अब बिरसा भगवान कह कर याद करते हैं उन्होंने  कहा मुंडा आदिवासियों को अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके विरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था संस्था सचिव पवन शंखधार ने कहा कि उन्नीसवीं सदी में  बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में  एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में  हुआ था मुंडा रीति रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पति वार के हिसाब से बिरसा रखा गया था बिरसा के पिता का नाम सुगना  मुंडा और माता का नाम करमी हूट था बिरसा औरउसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगानदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं सेहुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिनबाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत सेआदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं
संस्था के जिला उपाध्यक्ष रोहिताश सिंह पटेल ने कहा कि बिरसा ने अपनी अन्तिम साँसें 9 जून 1900 को राँची कारागार में लीं। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगालके आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवानकी तरह पूजा जाता है जन-सामान्य का बिरसा में काफ़ी दृढ़ विश्वास हो चुका था, इससे बिरसा को अपने प्रभाव में वृद्धि करने में मदद मिली। लोग उनकी बातें सुनने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे। बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया। लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी। उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और जो मुंडा ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे।

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