राम स्वरुप तुम्हार…. विपर्णा शर्मा

राम कहाँ बसते हैं…बाबा तुलसी ने स्वाभाविक उत्तर दिया….”पूर्णतः समर्पित हृदय में”….

राम स्वरुप तुम्हार बचन अगोचर, बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार “नेति नेति”नित निगम कह ।।
राम स्वरुप तुम्हार….

सुनहु राम अब कहउँ निकेता।
जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।

जिन्हके श्रवण समुद्र समाना।
कथा तुम्हारी सुभग सरि नाना।।
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे।
तिन्हके हिय तुम कहुँ गृह रूरे।।

लोचन चातक जिन्ह करि राखे।
रहहिं दरश जलधर अभिलाषे।।
तिन्हके हृदय सदन सुखदायक।
बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।

जस तुम्हार मानस बिमल
हंसिनि जीहा जासू।
मुकुटाहल गुन गन चुनई
राम बसहु हिय तासु।।

सब करि मांगहिं एक फल राम चरन रति होऊ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनन्दन दोउ।।

काम कोह मद मान न मोहा।
लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया।
तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।

“कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी।
जागत सोवत सरन तुम्हारी।।
तुम्हहिं छाड़ि गति दुसरि नाहीं।
राम बसहु तिन्हके मन माहीं।।”

स्वामी सखा पित मात गुर जिन्हके सब तुम तात।
मन मन्दिर तिन्हके बसहु सिय सहित दोऊ भ्रात।।

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा।
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।
राम भगति प्रिय लागहिं जेही।
तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।

जाति पाति धनु धरम बड़ाई।
प्रिय परिवार सदन सुखदायी।।
सब त्यजि तुम्हहि रहइ उर लाई।
तेहि के हृदय रहहु रघुराई।।

“जाहि न चहिअ कबहूँ कछू तुम्ह सन सहज सनेहू।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।”

(रामचरितमानस)

 

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